बिहार में त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था को अधिक प्रभावी, पारदर्शी और प्रशासनिक दृष्टि से सुगम बनाने के लिए राज्य सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। बिहार के पंचायती राज विभाग ने प्रदेश की ग्राम पंचायतों के नए सिरे से परिसीमन (Delimitation of Gram Panchayats) को लेकर आधिकारिक अधिसूचना (Notification) जारी कर दी है।
सरकार के इस नए नियम के तहत अब राज्य की पंचायतों का पुनर्गठन और सीमा निर्धारण नए मापदंडों के आधार पर किया जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया की कमान जिला स्तर पर जिलाधिकारी (DM) को सौंपी गई है।
क्या है नया नियम? अब कैसे तय होगा पंचायत का नाम?
अधिसूचना के अनुसार, परिसीमन के दौरान पंचायतों के नामकरण और उनके प्रशासनिक ढांचे में मुख्य रूप से निम्नलिखित बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे:
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अधिक आबादी वाले गांव के नाम पर पंचायत: अब तक जिन ग्राम पंचायतों का नाम किसी कम आबादी वाले गांव के नाम पर चल रहा था, उसे बदला जाएगा। नए नियम के तहत जिस गांव में सबसे अधिक जनसंख्या होगी, उसी गांव के नाम पर उस पूरी पंचायत का नाम रखा जाएगा।
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भौगोलिक सुगमता (Geographical Proximity): परिसीमन के दौरान इस बात का विशेष ध्यान रखा जाएगा कि पंचायत में शामिल सभी राजस्व गांव (Revenue Villages) एक-दूसरे से सटे हों, ताकि ग्रामीणों को मुख्य पंचायत भवन या ब्लॉक तक पहुंचने में दूरी न तय करनी पड़े।
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जनसंख्या का नया मापदंड: मैदानी और सुदूर इलाकों की जनसंख्या और वार्डों के पुनर्गठन को ध्यान में रखते हुए पंचायतों की सीमाओं में फेरबदल किया जाएगा।
जिलाधिकारी (DM) करेंगे क्षेत्रों का निर्धारण
पंचायती राज विभाग के निर्देशानुसार, राज्य के सभी जिलों के डीएम को अपने-अपने जिले में परिसीमन की प्रक्रिया पूरी कराने के लिए अधिकृत किया गया है:
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सर्वे और ड्राफ्ट प्रकाशन: डीएम के नेतृत्व में जिला प्रशासन पंचायतों का नया नक्शा और ड्राफ्ट तैयार करेगा।
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आपत्ति एवं सुझाव (Objections & Suggestions): परिसीमन का प्रारंभिक प्रारूप (Draft) सार्वजनिक किया जाएगा, जिस पर ग्रामीण अपनी आपत्तियां और सुझाव दर्ज करा सकेंगे।
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अंतिम प्रकाशन: प्राप्त आपत्तियों का निपटारा करने के बाद ही पंचायतों की नई सूची और सीमा का अंतिम प्रकाशन (Final Gazette) जारी किया जाएगा।
इस निर्णय का ग्रामीणों पर क्या पड़ेगा प्रभाव?
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सरकारी योजनाओं का बेहतर क्रियान्वयन: पंचायतों का सही भौगोलिक परिसीमन होने से विकास योजनाओं की राशि का समान वितरण हो सकेगा।
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प्रशासकीय कार्यों में आसानी: ग्रामीणों को जाति, आय, निवास प्रमाण पत्र या पंचायत से जुड़े अन्य कार्यों के लिए दूर नहीं जाना पड़ेगा।
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स्थानीय विवादों का समाधान: लंबे समय से चले आ रहे ग्राम सीमा और नामावली विवादों को इस प्रक्रिया से स्थायी रूप से सुलझाया जा सकेगा।